जम्मू के कैंसर अस्पतालों में जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे मरीजों की दास्तां हर किसी के लिए एक गंभीर चेतावनी है। शौक या दोस्तों के दबाव में शुरू हुई सिगरेट, बीड़ी या गुटके की यह लत किस तरह इंसानी जिंदगी को तबाह कर देती है, इसका अंदाजा मरीजों की आपबीती से लगाया जा सकता है। अस्पताल के बिस्तरों पर दर्द और बेबसी के साथ जिंदगी गुजार रहे ये लोग आज अपनी इस आदत पर पछतावा कर रहे हैं।


बचपन की आदत और लंबी सजा
उधमपुर जिले के मानसर-बट्टाल इलाके के रहने वाले 77 वर्षीय हसन दीन फेफड़ों के कैंसर से पीड़ित हैं। उन्होंने बहुत कम उम्र में ही अपने पिता की जेब से बीड़ी चुराकर पीना शुरू कर दिया था। परिवार की मुश्किलों और माता-पिता की नाराजगी के बावजूद उनकी यह लत छूट नहीं पाई और वे दिन में बीड़ी के कई पैकेट पीने लगे। हालांकि अब उन्होंने धूम्रपान छोड़े हुए तीन साल हो चुके हैं, लेकिन शरीर को जो नुकसान पहुंचना था, वह पहले ही हो चुका था।

चैन-स्मोकिंग ने घटाई उम्र
इसी तरह, सांबा जिले के डियानी गांव के 74 वर्षीय अब्दुल कय्यूम पिछले कई महीनों से स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट में फेफड़ों के कैंसर का इलाज करवा रहे हैं। उन्होंने पचास से अधिक वर्षों तक लगातार धूम्रपान किया। उनका कहना है कि शौक के रूप में शुरू हुई यह आदत इतनी गहरी हो गई कि इसने उनकी जिंदगी के कई साल कम कर दिए। आज आलम यह है कि वे बिना किसी सहारे के कमरे से बाहर भी नहीं निकल पाते हैं।


विशेषज्ञों की राय और आंकड़े
विशेषज्ञों के मुताबिक, पुरुषों में फेफड़े, सिर और गर्दन के कैंसर के मामलों की मुख्य वजह तंबाकू का सेवन है। इनमें से अधिकांश मामले किसी न किसी रूप में तंबाकू के इस्तेमाल से जुड़े होते हैं। डॉक्टरों का कहना है कि तंबाकू से होने वाले कैंसर की शुरुआत अक्सर किशोरावस्था से ही हो जाती है और इसे विकसित होने में लगभग 15 से 20 साल का समय लगता है। हालांकि, यदि कैंसर की पहचान शुरुआती चरणों में हो जाए, तो इसका सफल इलाज संभव है।


















