इस साल मानसूनी बारिश में कमी और अल नीनो के प्रभाव के कारण देश में धान के उत्पादन में लगभग एक करोड़ टन की भारी गिरावट आने की आशंका जताई जा रही है। कृषि मंत्रालय के अनुमान के अनुसार, इस बार चावल का कुल उत्पादन घटकर करीब 14.4 करोड़ टन रह सकता है, जो पिछले एक दशक में सबसे बड़ी गिरावट हो सकती है। हालांकि, सरकार के पास पर्याप्त सरकारी भंडार मौजूद होने के कारण घरेलू आपूर्ति पर तत्काल कोई बड़ा संकट आने की संभावना नहीं है।


चावल के रकबे और पैदावार पर असर
भारत में इस साल मानसूनी बारिश सामान्य से करीब 15 प्रतिशत कम दर्ज की गई है, जबकि कुछ प्रमुख धान उत्पादक क्षेत्रों में यह कमी 42 प्रतिशत तक पहुंच गई है। बारिश की कमी के चलते इस साल धान की खेती का रकबा पिछले साल के 445.92 लाख हेक्टेयर से घटकर 429.28 लाख हेक्टेयर रह गया है। फसल तैयार होने के अंतिम चरण में नमी की कमी के कारण प्रति हेक्टेयर पैदावार पर भी विपरीत प्रभाव पड़ने का खतरा मंडरा रहा है।

अन्य खरीफ फसलों की स्थिति
कमजोर मानसून का असर केवल धान तक सीमित नहीं है, बल्कि अन्य खरीफ फसलों का कुल रकबा भी पिछले वर्ष के मुकाबले कम हुआ है। आंकड़ों के मुताबिक, मक्का और सोयाबीन जैसी प्रमुख फसलों के रकबे में भी गिरावट दर्ज की गई है। देश के सैकड़ों जिलों में सामान्य से कम बारिश होने के कारण कृषि क्षेत्र को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जिससे बाजार में कीमतों पर भी दबाव बढ़ सकता है।

सरकारी बफर स्टॉक से राहत
उत्पादन घटने की इस चिंता के बीच एक बड़ी राहत यह है कि देश में पर्याप्त मात्रा में चावल का बफर स्टॉक उपलब्ध है। सितंबर तक विभिन्न राज्यों के पास लगभग 5.96 करोड़ टन का सरकारी भंडार सुरक्षित है, जो सामान्य जरूरतों से काफी अधिक है। यही वजह है कि उत्पादन में कमी आने के बावजूद तत्काल रूप से घरेलू बाजार और निर्यात पर भारी असर पड़ने की संभावना नहीं है।


















