उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में पारंपरिक जलस्रोत और नौले लंबे समय से स्थानीय संस्कृति और लोक आस्था का अहम हिस्सा रहे हैं। कपकोट तहसील में स्थित भगवान लाटू देव मंदिर के समीप बना एक पुराना नौला ऐसी ही परंपरा और मान्यता का केंद्र बना हुआ है। स्थानीय निवासियों का ऐसा विश्वास है कि इस नौले का पानी बच्चों के बोलने से जुड़ी कठिनाइयों को ठीक कर सकता है。


लाटू देव मंदिर और नौले का धार्मिक महत्व
मंदिर के पुजारी लीलाधर उपाध्याय के अनुसार, इस क्षेत्र में लाटू देव मंदिर और नौले का पारंपरिक एवं धार्मिक दोनों रूप से बड़ा महत्व है। इसी लोक मान्यता के कारण दूर-दराज के इलाकों से लोग यहां आते हैं और बच्चों के वाक् दोष को दूर करने की उम्मीद में इस जलस्रोत से पानी ले जाते हैं। हाल ही में सोशल मीडिया के माध्यम से इस अनोखी परंपरा के बारे में अधिक लोगों को पता चला है, जिससे प्रवासियों का ध्यान भी इस विरासत की ओर आकर्षित हुआ है。

सोशल मीडिया से बढ़ी परंपरा की जानकारी
मुंबई में कार्यरत कमल गढ़िया हाल ही में अपने पैतृक गांव लौटे और उन्होंने लाटू देव मंदिर में मत् टेकने के साथ ही इस ऐतिहासिक नौले से जल भी प्राप्त किया। उन्होंने इस जल को मुंबई ले जाने की बात कही। कमल का कहना है कि उन्हें इस प्राचीन परंपरा और लोक मान्यता के बारे में सोशल मीडिया के जरिए ही जानकारी मिली थी, जिसके बाद उन्होंने गांव आने पर इस स्थल पर जाने का निर्णय लिया। हालांकि, इन मान्यताओं का कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है, लेकिन लोगों की अटूट श्रद्धा पीढ़ियों से इस परंपरा को जीवित रखे हुए है।

सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण
पहाड़ी राज्यों में ये प्राचीन जलस्रोत केवल पानी की जरूरत को पूरा करने के माध्यम नहीं हैं, बल्कि यह क्षेत्र के इतिहास और सांस्कृतिक धरोहर का भी प्रतीक हैं। इनसे जुड़ी कहानियां और मान्यताएं सदियों से चली आ रही हैं। जानकारों का मानना है कि इन जलस्रोतों के संरक्षण के साथ इनकी लोक कथाओं को सहेजना भी आवश्यक है, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी रह सकें।















