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नीदरलैंड्स में अंतर्राष्ट्रीय आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ. डी. के. श्रीवास्तव के मार्गदर्शन में ‘राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस’ आयोजित

नीदरलैंड्स में अंतर्राष्ट्रीय आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ. डी. के. श्रीवास्तव के मार्गदर्शन में ‘राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस’ आयोजित: यूरोपीय चिकित्सकों ने माना आयुर्वेद को वैश्विक चिकित्सा का भविष्य

कुवाक्त (नीदरलैंड्स):

‘नवजीवनम् आयुर्वेदा इंस्टीट्यूट्स’ (ऋषिकेश, भारत) के संस्थापक, मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) और अंतर्राष्ट्रीय आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ. डी. के. श्रीवास्तव (MD-आयुर्वेद, स्वर्ण पदक विजेता) के मार्गदर्शन में 23 सितंबर को नीदरलैंड्स में ‘राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस’ के अवसर पर एक विशेष वैज्ञानिक संगोष्ठी और कार्यशाला का आयोजन किया गया।

 

18 सितंबर से 15 अक्टूबर 2026 तक यूरोप के विभिन्न क्षेत्रों (जेंट, जीलैंड , ट्रनॉज़िया ,लूज़र्न ,ज़्यूरिख़ स्विट्ज़लैंड, बेल्जियम और ब्राबंट) में आयोजित हो रही “वर्कशॉप एंड हीलिंग थ्रू आयुर्वेदा इन यूरोप” श्रृंखला के अंतर्गत इस कार्यक्रम का सफल संपादन हुआ। इस संगोष्ठी में नीदरलैंड्स और बेल्जियम सहित यूरोप के कई प्रमुख डॉक्टरों और चिकित्सा विशेषज्ञों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।

 

संगोष्ठी के दौरान डॉ. डी. के. श्रीवास्तव ने आयुर्वेद के गूढ़ एवं रहस्यमयी विज्ञान पर प्रकाश डालते हुए बताया कि किस प्रकार यह प्राचीन भारतीय पद्धति केवल शारीरिक व्याधियों का ही नहीं, बल्कि शरीर और मन दोनों का एकीकृत उपचार करती है। डॉ. श्रीवास्तव, जिन्हें वैश्विक स्तर पर 30 से अधिक वर्षों का गहन चिकित्सीय अनुभव प्राप्त है और जो 16 से अधिक देशों में आयुर्वेदिक कार्यशालाओं का नेतृत्व कर चुके हैं, ने उपस्थित यूरोपीय चिकित्सकों को नाड़ी परीक्षा (पल्स डायग्नोसिस) और आयुर्वेद के मूलभूत सिद्धांतों की वैज्ञानिकता से अवगत कराया।

 

यूरोपीय डॉक्टरों ने आयुर्वेद के इस सूक्ष्म दृष्टिकोण और मूल सिद्धांतों को गहराई से समझा तथा इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। पश्चिमी चिकित्सकों ने स्वीकार किया कि आधुनिक दौर में जब तनाव और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं, तब आयुर्वेद का समग्र दृष्टिकोण (होलिस्टिक एप्रोच) ही संपूर्ण मानव जाति के लिए सबसे मजबूत आरोग्य प्रणाली (हीलिंग पैटर्न) सिद्ध होगा।

 

इस अवसर पर आयोजकों की ओर से एनेरिएट और जेन वान केम्पेन भी उपस्थित रहे, जिन्होंने पूर्व और पश्चिम के इस सांस्कृतिक व चिकित्सीय समन्वय को एक बेहतर स्वास्थ्यप्रद विश्व के निर्माण में अत्यंत महत्वपूर्ण कदम बताया।