आज के समय में महात्मा गांधी की मौजूदगी को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों का रवैया और भारतीय समाज की वास्तविक स्थिति एक बड़ा वैचारिक सवाल बन चुकी है। इतिहासकार आलोक वाजपेयी के एक हालिया आलेख के अनुसार, राजनीति के गलियारों और दलीय सीमाओं से परे जाकर यदि देखा जाए, तो गांधी आज भी देश के आम जनमानस के भीतर रचे-बसे नजर आते हैं।


राजनीतिक दलों और गांधी की विरासत
देश की राजनीति में गांधी को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण देखने को मिलते हैं। एक तरफ जहां दक्षिणपंथी विचारधारा के राजनीतिक दल गांधी के खिलाफ दुष्प्रचार करने में जुटे रहते हैं, क्योंकि उनकी राजनीति के लिए गांधी के विचार एक बड़ी बाधा हैं। वहीं दूसरी तरफ, अन्य राजनीतिक दल केवल औपचारिक रूप से उनका नाम अपने सियासी फायदे के लिए इस्तेमाल करते हैं। कांग्रेस पार्टी के पास गांधी-नेहरू की ऐतिहासिक और वैचारिक विरासत का सबसे बड़ा हिस्सा होने के बावजूद, आज के नेताओं में उस वैचारिक गहराई और आत्मविश्वास की कमी दिखती है जिसके दम पर वे इस विरासत को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ा सकें।

औपनिवेशिक विरासत और सामाजिक विभाजन
ब्रिटिश शासनकाल में देश को कमजोर करने के लिए दो प्रमुख हथियार दिए गए थे—सांप्रदायिकता और जातिवाद। सांप्रदायिक राजनीति ने देश के विभाजन जैसी त्रासदियों को जन्म दिया और आज भी नफरत फैलाने वाली ताकतें समाज को नुकसान पहुंचा रही हैं। वहीं, जातिगत विभाजन के जरिए समाज को बांटने की जो कोशिशें औपनिवेशिक दौर में शुरू हुई थीं, वे भी आज के राजनीतिक परिदृश्य में समय-समय पर उभरकर सामने आती हैं।

आम जनता के दैनिक जीवन में गांधी
राजनीतिक उठापटक और वैचारिक संकट के बीच, आज भी देश के आम नागरिकों के बीच गांधी जीवित हैं। यह मौजूदगी किसी भाषण या सरकारी विज्ञापनों में नहीं, बल्कि लोगों के रोजमर्रा के व्यवहार में झलकती है:
- किसी अनजान व्यक्ति की संकट के समय मदद के लिए आगे आना।
- आपसी मतभेदों को गुस्से या हिंसा की बजाय बातचीत के जरिए सुलझाना।
- गलती स्वीकार करने का साहस रखना और उसूलों से समझौता न करना।
- तमाम उकसावों के बाद भी सामाजिक ताने-बाने और आपसी सौहार्द को बचाए रखना।
इन तमाम पहलुओं से यह स्पष्ट होता है कि भले ही राजनीतिक दल गांधी के आदर्शों को आत्मसात करने में असमर्थ दिखते हों, लेकिन भारतीय सभ्यता और संस्कृति की मूल चेतना में गांधी आज भी एक सशक्त प्रेरणा के रूप में मौजूद हैं।

















