तारिक़ रहमान इसी साल फ़रवरी में जब बांग्लादेश के प्रधानमंत्री बने तो भारत ने उन्हें नई दिल्ली आने का न्योता दिया.
तारिक़ रहमान ने इस न्योते को तरजीह नहीं दी और उन्होंने बतौर पीएम अपने पहले विदेशी दौरे के लिए मलेशिया को चुना.
मलेशिया के बाद तारिक़ रहमान चीन गए. इस बीच भारत ने तारिक़ रहमान को नई दिल्ली में आयोजित होने वाले ब्रिक्स समिट में अतिथि के तौर पर आने का न्योता फिर से दे दिया. इस दौरे पर भी बांग्लादेश के प्रधानमंत्री ने अब तक हामी नहीं भरी है.
बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने रविवार को कहा कि दोनों देशों के बीच प्रधानमंत्री तारिक़ रहमान की संभावित यात्रा को लेकर कई हफ़्तों से बातचीत चल रही है. मंत्रालय ने यह भी कहा कि पाँच अगस्त को दिल्ली के फॉरेन कॉरेस्पॉन्डेंट्स क्लब में अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख़ हसीना की प्रेस कॉन्फ्रेंस से दोनों देशों के रिश्तों का माहौल ख़राब हुआ है.
बांग्लादेश विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ए.के.एम. शाहिदुल करीम ने कहा था कि तारिक़ रहमान की यात्रा के लिए अनुकूल माहौल बनाया जाना ज़रूरी है.
ऐसे में सवाल उठता है कि भारत बांग्लादेश के प्रधानमंत्री को बुलाने के लिए इतनी मेहनत क्यों कर रहा है?
पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया की जियोपॉलिटिक्स पर गहरी नज़र रखने वाले पत्रकार सौरभ कुमार शाही कहते हैं कि भारत के पास इसके अलावा और विकल्प नहीं है.
भारत इतनी मेहनत क्यों कर रहा है?
सौरभ कुमार शाही कहते हैं, ”अब यह तो नहीं हो सकता कि कोई ऐसी हुक़ूमत आ गई है, जिससे आप इत्तेफाक नहीं रखते, तो आप उनके साथ इंगेज ही नहीं करेंगे. वही बात है, दोस्त तो बदल सकते हैं लेकिन पड़ोसी नहीं. ज़ाहिर है, इंगेज करने की कोशिश है. कई बार इंगेजमेंट करने से, अगर आप अपनी नीति में थोड़ा बदलाव लाते हैं, तो सुधार भी होता है. मिसाल के तौर पर प्यू रिसर्च का सर्वे देखिए, जिसमें तमाम देशों में इंडिया की अप्रूवल रेटिंग नापी गई है. उसमें जिस देश में इंडिया की अप्रूवल रेटिंग सबसे ज़्यादा बढ़ी है, वह श्रीलंका है.”
”जब श्रीलंका में सरकार आई थी, तब भी कहा गया था कि यह एंटी-इंडिया गवर्नमेंट है और इनके साथ कैसे होगा. लेकिन अंततः उनके साथ इंगेजमेंट हुआ. वे भारत आए, भारत में मुलाक़ात हुई, भारत से लोग वहाँ गए, वहाँ मुलाक़ात हुई. उसका असर ग्राउंड पर देखने को मिलेगा.”
उसी तरह प्यू रिसर्च के अनुसार, बांग्लादेश में आम लोगों का भारत के प्रति नाकारात्मक रुख़ बढ़ा है. प्यू रिसर्च सेंटर के ताज़ा सर्वे में 42% बांग्लादेशियों ने भारत के बारे में सकारात्मक राय दी जबकि 51% ने नकारात्मक राय व्यक्त की. सर्वे इसी साल फ़रवरी से मई के बीच हुआ था.
प्यू रिसर्च के 2024 के सर्वे के मुताबिक़ बांग्लादेश में 57 फ़ीसदी लोग भारत प्रति सकारात्मक राय रखते थे लेकिन 2026 में इसें 15 फ़ीसदी की गिरावट आई और अब महज 42 फ़ीसदी ही सकारात्मक राय रखते हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेश और पाकिस्तान में बड़ी संख्या में लोग भारत को अपने देश के लिए सबसे बड़ा ख़तरा भी मानते हैं.
सौरभ कुमार शाही कहते हैं कि प्यू रिसर्च के सर्वे से पता चलता है कि भारत को लेकर बांग्लादेश के आम लोगों में कैसा सेंटीमेंट है और इस सेंटीमेंट की कोई भी प्रधानमंत्री उपेक्षा नहीं कर सकता है.
शाही कहते हैं, ”तारिक़ रहमान विपक्ष में जमात-ए-इस्लामी के रहते इस सेंटीमेंट की उपेक्षा कैसे कर सकते हैं? उन्हें पता है कि भारत बांग्लादेश के लिए अहम देश है क्योंकि 94 प्रतिशत सीमा भारत से ही लगती है. लेकिन सत्ता में रहना है तो उन्हें जनभावना का भी ख़्याल रखना होगा. मुझे लगता है कि भारत भी उनकी इस मजबूरी को समझता होगा.”
‘ये काम मोदी सरकार ही कर सकती है’
”कहीं भी कोई राइट-विंग पार्टी होती है, तो उसके पास यह विकल्प होता है कि वह बिना ग़द्दार कहलाने के डर के इस तरह के क़दम उठा सकती है. कहने का मतलब, डोनाल्ड ट्रंप ही यह हिम्मत कर सकते हैं कि नॉर्थ कोरिया के राष्ट्रपति के साथ बैठ जाएं. कोई डेमोक्रेट पार्टी वाला ऐसा करे तो उसे तुरंत ट्रेटर घोषित कर दिया जाएगा. या कल्पना कीजिए कि मनमोहन सिंह वाजपेयी की तरह पाकिस्तान चले जाते तो क्या होता.”
अमेरिका में बांग्लादेश में राजदूत रहे मोहम्मद हुमायूं कबीर मानते हैं कि बांग्लादेश अब बदल चुका है.
हुमायूं कबीर ने बांग्लादेश के प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार द डेली स्टार में 16 अगस्त को एक आर्टिकल में लिखा है, ”जुलाई 2024 के जनविद्रोह ने लोगों की आकांक्षाओं को बदल दिया है. अब बांग्लादेशी अधिक स्वतंत्र सोच रखने वाले, महत्वाकांक्षी और अपनी आकांक्षाओं को लेकर अधिक सजग हैं. इसके बाद हुए चुनाव को व्यापक रूप से निष्पक्ष और काफ़ी हद तक सभी की भागीदारी वाला माना गया, जिसमें बीएनपी भारी जनादेश के साथ सत्ता में












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