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उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027: फौजी फैक्टर और सैनिक कल्याण पर दलों का विशेष ध्यान

उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027: फौजी फैक्टर और सैनिक कल्याण पर दलों का विशेष ध्यान

उत्तराखंड में आगामी 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा ने सैनिक और पूर्व सैनिक परिवारों के बीच अपनी सक्रियता और फोकस को काफी बढ़ा दिया है। हल्द्वानी में हाल ही में आयोजित पांच हजार से अधिक पूर्व सैनिकों के भव्य गौरव सेनानी मिलन समारोह को इसी सियासी रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। इस कार्यक्रम में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की मौजूदगी को इस बात का प्रमाण माना गया कि पार्टी इस वर्ग को साधने के लिए कितनी गंभीर है। राज्य के चुनावी समीकरणों में सैन्य पृष्ठभूमि वाले परिवारों की भूमिका को बेहद अहम और निर्णायक माना जाता है।

उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027: फौजी फैक्टर और सैनिक कल्याण पर दलों का विशेष ध्यान

सैनिक और पूर्व सैनिक मतदाता का राजनीतिक प्रभाव

पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में सेवारत सैनिकों और पूर्व सैनिकों की कुल संख्या लगभग 3.3 प्रतिशत आंकी जाती है। हालांकि, उनके परिवारों, आश्रितों और रिश्तेदारों के व्यापक प्रभाव के कारण यह विशेष वोट बैंक बढ़कर बारह से तेरह प्रतिशत तक पहुंच जाता है। यही मुख्य कारण है कि पर्वतीय जिलों से लेकर मैदानी सीटों तक फैले इस वर्ग को अपने पाले में करने के लिए राजनीतिक दलों द्वारा लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। वन रैंक-वन पेंशन, राष्ट्रीय सुरक्षा, देश का रक्षा बजट और सैनिक सम्मान जैसे विषय इस पूरी राजनीतिक चर्चा के मुख्य केंद्र में बने हुए हैं।

प्रमुख मुद्दे और नीतियां

सैनिक बहुल इस राज्य में राजनीतिक नेताओं के भाषणों और अभियानों में सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़क ढांचे के विकास, बेहतर रक्षा साजो-समान और पूर्व सैनिकों की पेंशन विसंगतियों से जुड़े मुद्दे प्रमुखता से उठाए जा रहे हैं। 2015 में लागू की गई वन रैंक-वन पेंशन व्यवस्था को पूर्व सैनिकों की पेंशन में असमानता को कम करने की दिशा में एक बड़ा कदम बताया जाता है। इसके साथ ही, राज्य सरकार भी सैनिक कल्याण से जुड़े विभिन्न फैसलों को सामने रख रही है। शहीदों के गांवों में उनकी प्रतिमा स्थापित करने, मृत आश्रितों के नौकरियों के आवेदनों के लिए समय सीमा बढ़ाने और अग्निवीरों के लिए दस प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण तथा रोजगार सेल के गठन जैसी घोषणाओं को भी इस अभियान के तहत रेखांकित किया जा रहा है। हालांकि, नई सैन्य भर्ती योजनाओं को लेकर विपक्ष की ओर से उठाए जाने वाले सवाल और चुनौतियां भी इस चुनावी माहौल में अपनी जगह बनाए हुए हैं।

चुनावी रणनीति और भावनात्मक जुड़ाव

हल्द्वानी के इस मंच से राष्ट्रीय सुरक्षा और सैन्य क्षमता को मजबूत करने का बड़ा संदेश भी दिया गया। भाजपा पूर्व सैनिकों के बीच केवल यह संदेश नहीं देना चाहती कि उसने कल्याणकारी काम किए हैं, बल्कि वह कमजोर सुरक्षा व्यवस्था से मजबूत सैन्य क्षमता तक के आख्यान को स्थापित करना चाहती है। समारोहों और आयोजनों के माध्यम से पूर्व सैनिकों से सीधा संवाद स्थापित किया जा रहा है, ताकि उनके परिवारों के जरिए व्यापक सामाजिक प्रभाव और एक भावनात्मक माहौल तैयार किया जा सके। सैनिक कल्याण मंत्री गणेश जोशी का खुद को मंत्री के बजाय ‘लांसनायक’ के रूप में पूर्व सैनिकों के बीच प्रस्तुत करना भी इसी भावनात्मक जुड़ाव को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना गया। आने वाले समय में उत्तराखंड की राजनीति में यह सैन्य और सुरक्षा आधारित चुनावी नैरेटिव और अधिक प्रभावी होने की पूरी संभावना है।