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सुप्रीम कोर्ट ने उठाई शराबबंदी की प्रभावशीलता पर उंगली, गिनाए पांच बड़े नुकसान

सुप्रीम कोर्ट ने उठाई शराबबंदी की प्रभावशीलता पर उंगली, गिनाए पांच बड़े नुकसान

सुप्रीम कोर्ट ने शराबबंदी की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए इससे जुड़ी पांच बड़ी बुराइयों को उजागर किया है। अदालत ने यह टिप्पणियां महाराष्ट्र पॉइजन रूल्स से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान कीं और देश के विभिन्न हिस्सों में जहरीली शराब की घटनाओं का भी हवाला दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने उठाई शराबबंदी की प्रभावशीलता पर उंगली, गिनाए पांच बड़े नुकसान

शराबबंदी से जुड़े पांच प्रमुख नुकसान

अदालत ने शराबबंदी नीति के परिणामों पर चर्चा करते हुए इसके पांच मुख्य नुकसानों को रेखांकित किया है:

  • राजस्व की भारी क्षति: शराब की बिक्री प्रतिबंधित होने से सरकार को आबकारी शुल्क के रूप में मिलने वाले बड़े राजस्व का नुकसान होता है।
  • लागू करने का भारी खर्च: राज्यभर में कानून को कड़ाई से लागू करने और निगरानी रखने पर सरकारी खजाने पर बड़ा वित्तीय बोझ पड़ता है।
  • पुलिस तंत्र में भ्रष्टाचार: शराबबंदी के कारण अवैध गतिविधियों को बढ़ावा मिलता है, जिससे पुलिस और प्रशासन में भ्रष्टाचार का दायरा फैलता है।
  • अवैध और नकली शराब का धंधा: वैध विकल्प न मिलने पर अपराधी और माफिया सक्रिय हो जाते हैं, जिससे जहरीली और नकली शराब का काला बाजार पनपने लगता है।
  • नशीले पदार्थों का बढ़ता चलन: शराब की अनुपलब्धता के कारण लोग नशे के अन्य खतरनाक विकल्पों की ओर आकर्षित होने लगते हैं, जिससे ड्रग्स का खतरा बढ़ता है।

महाराष्ट्र पॉइजन रूल्स किए गए रद्द

न्यायालय की पीठ ने महाराष्ट्र पॉइजन रूल्स के उन नियमों को रद्द कर दिया जिनके तहत मेथनॉल की खरीद को प्रतिबंधित किया गया था और गैर-दवा निर्माताओं को बेचने से पहले रंग व कड़वा पदार्थ मिलाना अनिवार्य किया गया था। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार यह साबित करने में विफल रही कि इन नियमों से जहरीली शराब की त्रासदियों को रोकने में कैसे मदद मिलेगी।

अदालत की अन्य महत्वपूर्ण टिप्पणियां

अदालत ने स्पष्ट किया कि इतिहास इस बात का गवाह है कि पूर्ण शराबबंदी के कारण अक्सर शराब का व्यापार अवैध हो जाता है, जिससे घातक और अनियमित शराब का चलन बढ़ता है। पीठ ने गुजरात और मध्य प्रदेश जैसी जगहों पर हाल ही में हुई जहरीली शराब की त्रासदियों का भी उल्लेख किया और कहा कि केवल अच्छी मंशा होने से कोई नियम मनमानेपन के परीक्षण में सही साबित नहीं हो सकता।