मतदाता सूची के पुनरीक्षण से जुड़े SIR अभियान और नए Form-6 को लेकर चुनाव आयोग तथा सुप्रीम कोर्ट के बीच स्थिति गंभीर होती नजर आ रही है। इस पूरे प्रकरण में नए फॉर्म के साथ जोड़े गए घोषणा पत्र और अदालती फैसलों की व्याख्या को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।


27 मई के फैसले और फॉर्म-6 का विवाद
बिहार से शुरू हुए विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR की प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट ने अपने 27 मई 2026 के फैसले में मतदाता सूची के शुद्धिकरण के उद्देश्य से सही ठहराया था। हालांकि, फैसले के बाद नए Form-6 में कुछ बदलाव किए जाने और ऑनलाइन पोर्टल पर अपलोड किए जाने के बाद से विवाद शुरू हुआ। ऑनलाइन आवेदन के दौरान नए फॉर्म में आवेदक के माता-पिता या पूर्वजों के पिछले SIR से जुड़े मतदाता विवरण की अनिवार्य जानकारी मांगने का प्रावधान जोड़ा गया था।

चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां और प्रेस नोट
सामने आई जानकारी के अनुसार, इस बदलाव से पहले कुछ चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति जताई थी कि सरकार की औपचारिक मंजूरी के बिना फॉर्म में इस प्रकार के संशोधन नहीं किए जाने चाहिए। इसके बावजूद बाद में सितंबर के अंत में जारी एक प्रेस नोट में आयोग की ओर से यह दावा किया गया कि Form-6 से जुड़ी इस घोषणा को सर्वोच्च अदालत द्वारा सही ठहराया गया है।

सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया और आगे की स्थिति
हाल ही में अक्टूबर की शुरुआत में हुई सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि अदालत ने कभी भी इस नए Form-6 को मंजूरी नहीं दी थी। इस अदालती रुख के बाद आयोग के दावों की वैधता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं और इस पूरे मामले में विधिक तथा संवैधानिक प्रक्रिया के तहत आगे की सुनवाई जारी है।


















