उत्तराखंड कांग्रेस इस समय भाजपा से मुकाबले की तैयारी कर रही है, लेकिन उससे पहले पार्टी के सामने अपने ही घर को संभालने की चुनौती खड़ी हो गई है। पार्टी के वरिष्ठतम नेताओं में शामिल पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत एक बार फिर अपनी अलग राजनीतिक राह पर चलते नजर आ रहे हैं। हाईकमान की आपत्ति के बावजूद उनकी जनसंवाद यात्रा जारी रहना कांग्रेस के भीतर चल रही खींचतान को और उजागर कर रहा है। रावत की इस सक्रियता को उनके समर्थक कांग्रेस को मजबूत करने की मुहिम बता रहे हैं। खुद रावत भी जनता से संवाद को कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनाने की कवायद बताते रहे हैं। लेकिन पार्टी के भीतर एक दूसरा सवाल भी तेजी से उठ रहा है कि क्या हरीश रावत वास्तव में कांग्रेस के लिए जमीन तैयार कर रहे हैं या 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अपने और अपने परिवार के राजनीतिक भविष्य की जमीन मजबूत कर रहे हैं ?


यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि रावत ने अब खानपुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की इच्छा सार्वजनिक कर दी है। हरिद्वार जिले में उनकी लगातार सक्रियता और ‘खानपुर मांगे बदलाव’ जैसे नारों ने इस चर्चा को और हवा दी है। रावत की उम्र 78 वर्ष है। कुछ समय पहले तक वह चुनावी राजनीति से दूरी बनाने की बात कह चुके थे। यहां तक कि उन्होंने कहा था कि पार्टी टिकट न दे तो वह घर बैठने को भी तैयार हैं। लेकिन अब तस्वीर बदलती दिखाई दे रही है। खानपुर से उनकी संभावित दावेदारी के साथ ही कुमाऊं मण्डल में उनके बेटे आनंद रावत की राजनीतिक सक्रियता की चर्चा भी तेज हुई है। कुछ विधानसभा सीटों पर उनकी चहलकदमी बढ़ी है। ऐसे में कांग्रेस के भीतर स्वाभाविक सवाल है कि यदि पिता और पुत्र दोनों चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी करते हैं तो क्या पार्टी के पास परिवार के लिए दो टिकट देने की गुंजाइश होगी ? यही वह बिंदु है जहां पर कांग्रेस को मजबूत करने की राजनीति और परिवार को राजनीतिक में एडजेस्ट करने की मंशा के बीच की रेखा धुंधली होती दिखाई देती है।

हरीश रावत पर परिवारवाद की राजनीतिक को लेकर सवाल आज के नहीं हैं। उनके परिवार के कई सदस्य चुनावी राजनीति में आ चुके हैं। उनकी बेटी अनुपमा रावत वर्तमान में हरिद्वार ग्रामीण से कांग्रेस विधायक हैं। 2022 में उन्होंने वह सीट जीती थी, जिस पर उनके पिता 2017 में चुनाव हार गए थे। उनके बेटे वीरेंद्र रावत को कांग्रेस ने 2024 के लोकसभा चुनाव में हरिद्वार से उम्मीदवार बनाया था। अर्थात रावत परिवार की अगली पीढ़ी अब उत्तराखंड की चुनावी राजनीति में स्थापित हो चुकी है। यहीं से परिवारवाद का सवाल कांग्रेस के सामने खड़ा होता है। अब हरीश रावत खुद के लिए खानपुर और बेटे आनन्द के लिए कुमाऊं की किसी सीट से टिकट मांग रहे हैं। कुछ दिनों पहले बीमारी से उबरने के बाद हरीश रावत ने बेटे आनन्द और खुद के चुनावी मैदान में उतरने के संकेत दिए उससे साफ है कि हरीश अब पार्टी हाईकमान पर दबाव बना रहे हैं। मौजूदा घटनाक्रम इस आशंका को ज्यादा मजबूती देता है। क्योंकि कांग्रेस हाईकमान ने उन्हें व्यक्तिगत अभियान के बजाय सामूहिक पार्टी कार्यक्रमों पर जोर देने का संदेश दिया। इसके बावजूद रावत ने अपनी जनसंवाद यात्रा जारी रखी।
सच तो यह है कि हरीश रावत जैसे कद के नेता के लिए यह कहना आसान है कि वह कांग्रेस को मजबूत करने के लिए जनता के बीच जा रहे हैं। लेकिन संगठन के दूसरे धड़ों के लिए सवाल यह है कि यदि हर बड़ा नेता अपनी-अपनी यात्रा, अपना-अपना कार्यक्रम और अपना राजनीतिक एजेंडा चलाने लगे तो फिर संगठनात्मक अनुशासन और सामूहिक नेतृत्व का क्या अर्थ रह जाएगा ? अब तो फिजां में यह सवाल भी तैरने लगा है कि हरीश रावत कांग्रेस के लिए राजनीतिक पूंजी हैं या फिर बोझ ? उथल-पुथल से भरी तमाम परिस्थितियों के बीच यह बुजुर्ग नेता लंबी राजनीतिक पारी खेल चुका है। अब पता नहीं इतिहास उन्हें किस रूप में याद करेगा।
आलेख : दीपक फर्स्वाण की फेसबुक वॉल से।


















