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अदालत ने नहीं, कुदरत ने दी सजा !

डी-5 कोठी के खौफनाक कहानियों के खलनायक सुरेंद्र कोली ने लगाई फांसी
19 साल बच्चों के लिए लड़ी इंसाफ की लड़ाई, कोर्ट ने सबूतों के अभाव में कर दिया बरी

आलेख – गुणानंद जखमोला (वरिष्ठ पत्रकार)

आज हरिद्वार के भूपतवाला में पुलिस ने चाय की टपरी लगाने वाले एक व्यक्ति को संदिग्ध अवस्था में फांसी पर लटका हुआ पाया। पुलिस प्रथमदृष्टया इसे आत्महत्या मान रही है। मरने वाला सुरेंद्र कोली था। वही सुरेंद्र, निठारी कांड का खलनायक। सुरेंद्र पर 2006 में सीरियल किलर का आरोप था कि उसने 11 बच्चों की घोर अमानवीय कृत्य के बाद हत्या की और 2 अन्य मामलों में उस पर कोठी मालिक मनिंदर सिंह पंधेर के साथ सहअभियुक्त बनाया गया था। लगभग 19 साल की अदालती लड़ाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने सुरेंद्र और मनिंदर को बरी कर दिया। कई अदालतों ने उसे फांसी की सजा भी सुनाई पर वह सभी में बच निकला। शीर्ष अदालत ने पिछली अदालतों के फैसलों को अविश्वसनीय और साक्ष्यों से इतर बताया।

क्या सुरेंद्र कोली निर्दाेष था? यदि वह निर्दाेष था तो दोषी कौन था? पुलिस और सीबीआई इतने जघन्य हत्याकांडों के बावजूद असली दोषी तक क्यों नहीं पहुंच सकी? सुप्रीम कोर्ट ने भी तथ्यों और जांच रिपोर्टों को आधार बनाया। शक के आधार पर सजा न देते हुए सुरेंद्र और मनिंदर दौनों को आखिरी केस से भी 2025 में बरी कर दिया गया। अपने बच्चों को न्याय दिलाने के लिए गरीब-मां-बाप 19 साल तक पुलिस, कोर्ट-कचहरी के धक्के खाते रहे। उनकी हिम्मत जवाब दे गयी और डी-5 कोठी का खौफनाक सच के दोषी सजा से बच गये।

लेकिन कहते हैं कि उसकी लाठी में आवाज नहीं होती। इंसाफ जरूर होता है। कुदरत का कानून सबसे बड़ा होता है ओर कुदरत के कानून ने संभवतः सुरेंद्र को वही सजा दे दी जो कोर्ट ने उसे कई बार दी, लेकिन वो हर बार बच निकला।