उत्तराखंड के उपभोक्ता आयोगों में समय पर न्याय न मिलने के कारण बड़ी संख्या में मामले वर्षों से लंबित पड़े हैं। राज्य और जिला उपभोक्ता आयोगों में कई मामले ऐसे हैं जो एक दशक से अधिक समय से अपने फैसले का इंतजार कर रहे हैं।


आरटीआई से सामने आए आंकड़े
सूचना अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी से यह बात सामने आई है कि उत्तराखंड के विभिन्न उपभोक्ता आयोगों में हजारों मामले अभी भी पेंडिंग हैं। उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत सामान्य मामलों को करीब तीन महीने और प्रयोगशाला परीक्षण वाले मामलों को पांच महीने में निपटाने का नियम तय किया गया है, लेकिन इसके बावजूद मामलों का अंबार लगा हुआ है। राज्य आयोग और तेरह जिला आयोगों में बड़ी संख्या में पुराने केस अभी भी विचाराधीन हैं।

लंबित मामलों की स्थिति
उपलब्ध विवरण के अनुसार, राज्य उपभोक्ता आयोग में भी दस साल से अधिक पुराने दर्जनों मामले लंबित हैं। इसके साथ ही जिला स्तर पर बने तेरह आयोगों में भी तीन हजार से ज्यादा विभिन्न मामले फैसले की आस में हैं। इन आंकड़ों से साफ होता है कि उपभोक्ताओं को त्वरित न्याय मिलने की प्रक्रिया काफी धीमी हो चुकी है।


घट रही है नए मामलों की संख्या
आंकड़ों पर गौर करें तो पिछले कुछ वर्षों में उपभोक्ता आयोगों में नए मामले दर्ज कराने वाले लोगों की संख्या में भी कमी आई है। जानकारों का मानना है कि मामलों के समय पर निस्तारण न होने और अपेक्षित राहत न मिलने के कारण लोग आयोगों का रुख करने से बच रहे हैं।
किन क्षेत्रों से जुड़े हैं सबसे ज्यादा मामले
विभिन्न सेक्टरों के लिहाज से देखें तो उपभोक्ता आयोगों में बीमा क्षेत्र से जुड़े मुकदमे सबसे अधिक संख्या में पहुंचे हैं। बीमा के अलावा बैंकिंग, विद्युत, और अन्य निजी सेवाओं से जुड़े विवाद भी बड़ी मात्रा में दर्ज किए गए हैं, जिनका निस्तारण अभी बाकी है।
















