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किशाऊ बांध परियोजना: जानिए उत्तराखंड ऊर्जा सचिव ने क्या दिए महत्वपूर्ण सवालों के जवाब

किशाऊ बांध परियोजना: जानिए उत्तराखंड ऊर्जा सचिव ने क्या दिए महत्वपूर्ण सवालों के जवाब

बहुप्रतीक्षित किशाऊ बांध परियोजना को लेकर हाल ही में छह राज्यों के बीच दिल्ली में एक महत्वपूर्ण समझौते पर हस्ताक्षर किए गए हैं, जिससे इस महत्वाकांक्षी योजना के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो गया है। इस समझौते के बाद परियोजना से जुड़े विभिन्न पहलुओं, नीतिगत निर्णयों और विस्थापन की योजनाओं को लेकर उत्तराखंड के ऊर्जा सचिव मीनाक्षी सुंदरम ने कई सवालों के स्पष्ट जवाब दिए हैं।

किशाऊ बांध परियोजना: जानिए उत्तराखंड ऊर्जा सचिव ने क्या दिए महत्वपूर्ण सवालों के जवाब

भूमि उपलब्धता और क्षतिपूरक वृक्षारोपण की चुनौतियां

उत्तराखंड ऊर्जा सचिव ने बताया कि इस परियोजना के डूब क्षेत्र में राज्य की काफी अधिक वन भूमि आ रही है। नियमानुसार क्षतिपूरक वृक्षारोपण के लिए लगभग दोगुनी जमीन की आवश्यकता होती है, जिसके चलते उत्तराखंड को करीब दो हजार एकड़ भूमि की जरूरत होगी। विस्थापित होने वाले परिवारों के पुनर्वास और जमीन की इस चुनौती को लेकर मुख्यमंत्री स्तर पर केंद्र सरकार और अन्य हितधारकों के साथ लगातार बातचीत की जा रही है।

डूब क्षेत्र में आने वाले गांव और वित्तीय प्रावधान

प्रारंभिक आकलन के अनुसार, इस योजना के दायरे में उत्तराखंड के तीन पूरे गांव और 17 आंशिक गांव आएंगे, हालांकि विस्तृत सर्वे के बाद ही सटीक आंकड़े सामने आ पाएंगे। जल घटक (वाटर कंपोनेंट) के खर्च का 90 प्रतिशत हिस्सा भारत सरकार वहन करेगी, जबकि राज्य का हिस्सा केवल 10 प्रतिशत रहेगा। वहीं, बिजली से जुड़े खर्च के लिए हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड को मिलकर काम करना है। उत्तराखंड का पानी का हिस्सा कम होने के कारण केंद्र सरकार से 50 साल के लिए ब्याज मुक्त ऋण की मांग की गई है, जिस पर सहमति बन चुकी है।

विस्थापन नीति और बिजली की हिस्सेदारी

विस्थापन और पुनर्वास को लेकर सचिव ने स्पष्ट किया कि हर परियोजना का प्रभाव अलग होता है, इसलिए नीति भी प्रोजेक्ट की जरूरतों और वास्तविक मांगों के आधार पर ही तैयार की जाती है। इस परियोजना से मिलने वाली बिजली में उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की पचास-पचास प्रतिशत की बराबर हिस्सेदारी होगी। ब्रिटिश काल यानी वर्ष 1940 से फाइलों में अटकी यह परियोजना अब केंद्रीय गृह मंत्री की अध्यक्षता में हुए समझौते के बाद धरातल पर उतरने की दिशा में आगे बढ़ रही है।