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मसूरी गोलीकांड के 32 साल पूरे, उत्तराखंड आंदोलन के शहीदों को दी जा रही है श्रद्धांजलि

मसूरी गोलीकांड के 32 साल पूरे, उत्तराखंड आंदोलन के शहीदों को दी जा रही है श्रद्धांजलि

उत्तराखंड राज्य के इतिहास में दो सितंबर का दिन एक अत्यंत महत्वपूर्ण, संवेदनशील और दर्दनाक अध्याय के रूप में दर्ज है। आज मसूरी गोलीकांड की बत्तीसवीं बरसी है और इस अवसर पर राज्यभर में उन आंदोलनकारियों को पूरी श्रद्धा के साथ याद किया जा रहा है, जिन्होंने पृथक राज्य की मांग को लेकर अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। खटीमा में हुई पुलिस फायरिंग की घटना के ठीक अगले दिन मसूरी में भड़के भारी आक्रोश और प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई में छह लोगों की जान चली गई थी, जिसने पूरे पर्वतीय क्षेत्र की दिशा बदल दी थी।

मसूरी गोलीकांड के 32 साल पूरे, उत्तराखंड आंदोलन के शहीदों को दी जा रही है श्रद्धांजलि

खटीमा कांड के विरोध से भड़का था आक्रोश

एक सितंबर 1994 को खटीमा में उत्तराखंड की मांग को लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोगों पर पुलिस ने गोलियां चलाई थीं, जिसमें कई आंदोलनकारियों की मौत हो गई थी। जब इस दुखद घटना की जानकारी मसूरी पहुँची तो स्थानीय नागरिकों और आंदोलनकारियों में भारी रोष फैल गया। खटीमा के मृतकों को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए लोग झूलाघर स्थित संयुक्त संघर्ष समिति के कार्यालय के पास एकत्र होने लगे थे। इसी दौरान स्थिति अत्यंत तनावपूर्ण हो गई और पुलिस तथा पीएसी की ओर से कार्रवाई शुरू हो गई। उपलब्ध विवरणों के अनुसार इस गोलीबारी में छह आंदोलनकारियों की मृत्यु हो गई और लगभग अठारह लोग गोली लगने से गंभीर रूप से घायल हो गए थे।

झूलाघर बना शहादत का प्रमुख स्थल

मसूरी का झूलाघर क्षेत्र इस घटना के बाद उत्तराखंड आंदोलन के सबसे प्रमुख और चर्चित शहादत स्थलों में शामिल हो गया। इस कठिन संघर्ष में महिलाओं ने भी बढ़-चढ़कर अपनी हिस्सेदारी दर्ज कराई थी। बेलमती चौहान और हंसा धनाई जैसी साहसी महिलाओं के बलिदान ने आंदोलन में महिलाओं की मुखर भूमिका को इतिहास में हमेशा के लिए अमर कर दिया। इस हृदयविदारक गोलीकांड में बलबीर सिंह नेगी, बेलमती चौहान, हंसा धनाई, धनपत सिंह, राय सिंह बंगारी और मदन मोहन ममगाईं शहीद हुए थे। इन सभी के नाम आज भी मसूरी के शहीद स्मारक पर पूरे सम्मान के साथ दर्ज हैं और लोग उन्हें नमन करते हैं।

राज्य गठन का लंबा संघर्ष और वर्तमान परिस्थितियां

इन तमाम घटनाओं के बाद पूरे पर्वतीय क्षेत्र में अलग राज्य की मांग को लेकर आंदोलन ने और अधिक उग्र रूप अख्तियार कर लिया। अक्टूबर 1994 में रामपुर तिराहा कांड जैसी अन्य दर्दनाक घटनाओं के बावजूद आंदोलनकारियों के कदम पीछे नहीं हटे। लंबे संघर्ष, धरने, प्रदर्शनों और कई लोगों की शहादत के बाद आखिरकार नौ नवंबर 2000 को उत्तराखंड एक अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आया। आज भी हर साल इस दिन मसूरी में विशेष श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जहां मुख्यमंत्री सहित तमाम लोग शहीद स्मारक पर पहुँचकर आंदोलनकारियों को याद करते हैं। हालांकि, राज्य के गठन के इतने वर्षों बाद भी आंदोलनकारी शहीदों के सपनों का सशक्त और समृद्ध उत्तराखंड बनाने की बात दोहराते हैं, जहां रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी चुनौतियां अब भी गंभीर बनी हुई हैं।