भाई-बहन के प्रेम और अटूट विश्वास का प्रतीक रक्षाबंधन का पावन पर्व इस वर्ष बेहद खास और विशेष ज्योतिषीय संयोग के साथ मनाया जा रहा है। जानकारों के अनुसार, लगभग सत्ताईस वर्षों के लंबे अंतराल के पश्चात इस बार इस उत्सव पर भद्रा का साया नहीं है। एक साथ पांच प्रमुख योगों का निर्माण होने से इस पर्व का धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व बहुत अधिक बढ़ गया है। पारंपरिक रूप से यह त्योहार श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि के दिन मनाया जाता है। यह पर्व केवल भाई-बहन के रिश्ते का ही नहीं, बल्कि प्राचीन गुरु-शिष्य परंपरा का भी प्रतीक माना जाता है। इस पावन दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र सजाकर उनकी सुख-समृद्धि की मंगल कामना करती हैं, जबकि गुरु अपने शिष्यों और पुरोहित अपने यजमानों को रक्षा सूत्र बांधकर आशीर्वाद प्रदान करते हैं।


दुर्लभ संयोग और पांच शुभ योग
ज्योतिषीय गणना और जानकारों के अनुसार, इस बार रक्षाबंधन के पावन अवसर पर सुकर्मा योग, बुधादित्य योग, उभयचरी योग, सर्वार्थ सिद्धि योग और त्रिपुष्कर योग का एक दुर्लभ संगम देखने को मिल रहा है। पारंपरिक रूप से भद्रा काल के दौरान रक्षाबंधन का कार्य करना अशुभ माना जाता है, लेकिन इस बार भद्रा रहित स्थिति होने के कारण पूरे दिन रक्षा सूत्र बांधने में किसी भी प्रकार की बाधा उत्पन्न नहीं होगी। उदय व्यापिनी सिद्धांत के अनुसार पूर्णिमा तिथि के प्रभाव से पूरे दिन पर्व मनाने की अनुकूलता बनी हुई है। इसके अलावा, इस दिन पूर्णिमा पर चंद्र ग्रहण भी पड़ रहा है, किंतु यह भारत में बिल्कुल दिखाई नहीं देगा। भारत में दृश्यमान न होने के कारण इस चंद्र ग्रहण का रक्षाबंधन के पर्व पर कोई प्रभाव नहीं माना जाएगा।

पूजा का समय और राहुकाल की जानकारी
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पर्व के दिन सुबह स्नान करने के पश्चात सबसे पहले भगवान को रक्षा सूत्र अर्पित करना चाहिए और लक्ष्मी-नारायण की पूजा-अर्चना करनी चाहिए। इस विशेष अवसर पर वैदिक ब्राह्मणों द्वारा श्रावणी उपक्रम के अंतर्गत यज्ञोपवीत बदलने की परंपरा का भी पालन किया जाता है। आचार्यों के मुताबिक रक्षाबंधन के दिन राखी बांधने का शुभ समय सुबह 5:57 बजे से 9:48 बजे तक बताया गया है। राहुकाल करीब 10:46 बजे से शुरू होकर एक बजे तक रहेगा, इस अवधि के बीच में राखी बांधने से बचने की सलाह दी जाती है। चूंकि अलग-अलग शहरों में सूर्योदय के समय और स्थानीय पंचांग के अनुसार समय में थोड़ा अंतर हो सकता है, इसलिए स्थानीय स्थिति का ध्यान रखना उचित रहता है।

पूजन की सामग्री और विधि
त्योहार के दौरान पूजा की थाली को विधिवत रूप से सुसज्जित करना चाहिए। पूजा की थाली में मुख्य रूप से राखी, रोली या कुमकुम, अक्षत, दीपक, मिठाई, पुष्प और जल रखना चाहिए। अनुष्ठान की विधि के तहत सबसे पहले भाई को स्वच्छ आसन पर बिठाना चाहिए। इसके बाद उसके माथे पर रोली या कुमकुम से तिलक लगाएं और अक्षत लगाएं। फिर भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधें। राखी बांधने के बाद भाई की आरती करें और उसे मिठाई खिलाएं।















