उत्तराखंड में पुलिस की एक पुरानी कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं, जिसकी अब नए सिरे से केंद्रीय जांच एजेंसी द्वारा पड़ताल की जाएगी। यह पूरा प्रकरण लगभग छह साल पुराना है, जब एक ढाबा संचालक को मादक पदार्थ के साथ गिरफ्तार किए जाने का दावा किया गया था। इस कार्रवाई के बाद से ही पुलिस की कार्यशैली लगातार संदेह के घेरे में बनी हुई है और मामले से जुड़े तमाम पहलुओं की नए सिरे से समीक्षा की जा रही है।


क्या था पूरा मामला और कैसे शुरू हुई कानूनी लड़ाई
वर्ष 2020 के दौरान एक ढाबा मालिक अनिल शर्मा को पुलिस द्वारा लगभग 97.70 ग्राम चरस के साथ पकड़े जाने की बात कही गई थी। हालांकि, इस गिरफ्तारी के तुरंत बाद ही मामला पूरी तरह उलझ गया और संबंधित पुलिसकर्मियों की भूमिका पर गंभीर आरोप लगाए गए। अदालत के निर्देश पर इस मामले की प्रारंभिक जांच कराई गई, जिसके परिणामों के आधार पर पुलिसकर्मियों के विरुद्ध गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया गया था।

जांच के दौरान यह आरोप लगाया गया कि पुलिस ने झूठे दस्तावेज तैयार किए, एक फर्जी मामला गढ़ा, महत्वपूर्ण सबूतों को मिटाया और संबंधित व्यक्ति को अवैध हिरासत में रखकर उसके साथ मारपीट की। इस प्रकरण में एक सब-इंस्पेक्टर प्रकाश चंद्र तामता समेत अन्य पुलिसकर्मियों के नाम मुख्य रूप से सामने आए थे। कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ी और यह मामला देश की सर्वोच्च अदालत तक भी पहुंचा, जिसके परिणामस्वरूप लंबी अदालती कार्यवाही और कानूनी दांव-पेंच का दौर काफी समय तक चलता रहा।

हाईकोर्ट के आदेश से बदला जांच का पूरा रुख
इस कानूनी प्रक्रिया में सबसे बड़ा मोड़ अदालत के एक महत्वपूर्ण आदेश के बाद आया। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब मुख्य आरोप पुलिस बल के कर्मियों पर ही लगे हुए हैं और पूरी पुलिस कार्यशैली संदिग्धावस्था में है, तो उसी विभाग से किसी भी प्रकार की निष्पक्ष जांच की उम्मीद नहीं की जा सकती है। इसके बाद, मूल एनडीपीएस मामले तथा पुलिसकर्मियों पर लगे ज्यादती एवं फर्जी मामला तैयार करने के तमाम आरोपों से जुड़े प्रकरण को केंद्रीय जांच एजेंसी को ट्रांसफर करने का निर्देश दिया गया।
जांच एजेंसी के सामने मुख्य सवाल और पुलिस का पक्ष
अब इस पूरी जांच की जिम्मेदारी केंद्रीय एजेंसी के एक वरिष्ठ अधिकारी को सौंपी गई है। जांच अधिकारियों के सामने मुख्य रूप से दो बड़े और अहम सवाल खड़े हैं। पहला सवाल यह है कि क्या वह कथित मादक पदार्थ वास्तव में संबंधित व्यक्ति के पास से बरामद हुआ था या नहीं। दूसरा सवाल यह है कि यदि पुलिस की शुरुआती कार्रवाई पूरी तरह गलत थी, तो क्या सीसीटीवी फुटेज, दस्तावेजों और अन्य महत्वपूर्ण सबूतों को जानबूझकर बदला या मिटाया गया था।
दूसरी तरफ, इस मामले में पुलिस पक्ष का अपना दावा रहा है। पुलिस का कहना है कि उन्हें उस ढाबे पर अवैध बिक्री की गुप्त सूचना मिली थी और नियमानुसार ही पूरी कार्रवाई को अंजाम दिया गया था। इसके अलावा पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज को आंशिक और बिना ऑडियो वाला बताया है। हालांकि, अदालत ने तमाम परिस्थितियों को देखते हुए राज्य पुलिस की जांच को पर्याप्त नहीं माना और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए केंद्रीय जांच एजेंसी के माध्यम से नए सिरे से पड़ताल का रास्ता साफ कर दिया है। अब तमाम दस्तावेजों, सीसीटीवी रिकॉर्ड और बयानों के आधार पर ही इस प्रकरण की असली सच्चाई सामने आ सकेगी।















