उत्तराखंड में वैज्ञानिकों ने इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन यानी आईवीएफ तकनीक का उपयोग करते हुए एक साहीवाल गाय की कोख से स्वस्थ बद्री बछिया को जन्म दिलाया है। केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय ने शनिवार को इस बारे में आधिकारिक जानकारी साझा की है। यह सफलता स्वदेशी बद्री नस्ल के संरक्षण, उनकी संख्या बढ़ाने और जिनेटिक सुधार की दिशा में बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। बद्री एक स्वदेशी गाय है जो मुख्य रूप से उत्तराखंड में पाई जाती है, और इस प्रक्रिया के तहत साहीवाल गाय में बद्री नस्ल का भ्रूण सफलतापूर्वक ट्रांसफर किया गया था। इस बछिया के जन्म के साथ ही स्थानीय पशुधन के विकास की दिशा में एक नया मील का पत्थर स्थापित हुआ है।


वैज्ञानिकों का तीन साल का लंबा शोध
यह बड़ी सफलता करनाल स्थित आईसीएआर-राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (आईसीएआर-एनडीआरआई) और उत्तराखंड के पंतनगर स्थित जीबी पंत एग्रीकल्चर एंड टेक्नोलॉजी यूनिवर्सिटी के आपसी सहयोग से हासिल की गई है। इस पूरी परियोजना को उत्तराखंड बायोटेक्नोलॉजी काउंसिल की तरफ से आर्थिक मदद प्रदान की गई थी। इस दिशा में शोध कार्य वर्ष 2023 से लगातार चल रहा था। इसकी शुरुआत जीबी पंत यूनिवर्सिटी के तत्कालीन वाइस-चांसलर डॉक्टर एमएस चौहान के नेतृत्व और पहल पर की गई थी। इस दौरान वैज्ञानिक टीमों ने बद्री गायों के लिए आईवीएफ तकनीक के जरिए भ्रूण तैयार करने और उन्हें गाय में ट्रांसफर करने के तरीकों पर बहुत बारीकी से काम किया था।

किस तरह काम करती है यह आईवीएफ तकनीक?
इस पूरी वैज्ञानिक प्रक्रिया के तहत सबसे पहले अल्ट्रासाउंड-गाइडेड ओवम पिक-अप की मदद ली गई, जिससे चुनिंदा बद्री डोनर गायों के अंडाणु को सावधानीपूर्वक इकट्ठा किया गया। इसके बाद इन अंडाणुओं को उचित रूप से बड़ा होने दिया गया। फिर उत्तराखंड पशुधन विकास बोर्ड से प्राप्त बद्री सांड के बेहतरीन और उत्तम शुक्राणुओं के साथ इनका आईवीएफ किया गया। लैब में इस प्रक्रिया से तैयार भ्रूण को सही समय पर गाय के गर्भ में स्थापित किया गया। ऐसा ही एक विशेष भ्रूण साहीवाल गाय के गर्भ में रखा गया था, जिसके बाद साहीवाल गाय ने एक स्वस्थ बद्री बछिया को जन्म दिया है। गाय को इस प्रक्रिया के लिए पहले से पूरी तरह तैयार किया जा रहा था।

आगे की योजनाएं और भविष्य की उम्मीदें
इस अभूतपूर्व प्रयोग की सफलता के बाद वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं का उत्साह काफी अधिक है। कृषि मंत्रालय की ओर से जारी बयान में यह भी बताया गया है कि वैज्ञानिकों की कोशिशें यहीं रुकने वाली नहीं हैं। आने वाले अगले 5 से 7 दिनों के भीतर एक क्रॉसब्रेड गाय के भी इसी तकनीक के माध्यम से एक और बद्री बछड़े को जन्म देने की पूरी संभावना है। इस प्रकार की उन्नत प्रजनन बायोटेक्नोलॉजी से पशुधन के क्षेत्र में बद्री जर्मप्लाज्म के संरक्षण और नस्ल सुधार के नए रास्ते खुलते नजर आ रहे हैं, जिससे भविष्य में स्थानीय नस्ल के संवर्धन को और अधिक गति मिलने की पूरी उम्मीद है।
















