उत्तराखंड के चंपावत जिले के लोहाघाट अंतर्गत सुंई गांव के रहने वाले वीर नायक रामदत्त चौबे की शहादत की कहानी लगभग 80 वर्षों के बाद इतिहास के पन्नों से बाहर आई है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान म्यांमार में देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने वाले रामदत्त चौबे का नाम वहां के ऐतिहासिक रंगून मेमोरियल की दीवार पर भी दर्ज है। हाल ही में परिजनों की खोजबीन और सेना के सहयोग से उनके बलिदान से जुड़े दस्तावेज सामने आए हैं, जिससे इस भूली हुई गाथा को नया प्रकाश मिला है। परिवार के सदस्यों और स्थानीय स्तर पर इस बात की चर्चा है कि कैसे यह महत्वपूर्ण इतिहास इतने लंबे समय तक जनमानस की नजरों से दूर रहा था।


कम उम्र में सेना में भर्ती हुए थे रामदत्त चौबे
शहीद के भतीजे खिलानंद चौबे से मिली जानकारी के अनुसार, भवानी दत्त चौबे के पुत्र रामदत्त चौबे ने बहुत कम उम्र में ही सेना का रुख किया था। वह 16 अप्रैल 1943 को मात्र 17 वर्ष की आयु में सेना में भर्ती हुए थे। इसके बाद उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान म्यांमार में दुश्मनों का डटकर मुकाबला किया। युद्ध के मोर्चे पर अदम्य साहस का परिचय देते हुए उन्होंने एक मार्च 1945 को अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दे दिया। उस समय उनकी कुल आयु मात्र 19 वर्ष की थी, इतनी छोटी सी उम्र में देश के लिए जान देना एक असाधारण और प्रेरणादायक बात थी।

सैन्य सम्मान और दस्तावेजों की प्राप्ति
उनकी इस महान शहादत के लिए सेना ने उन्हें मरणोपरांत कई प्रतिष्ठित पदकों से सम्मानित किया था, जिनमें 1939-45 स्टार, वर्मा स्टार और वार मेडल शामिल हैं। इसके अलावा कुमाऊं रेजिमेंट द्वारा वर्ष 1945 में ही उन्हें शहादत का दर्जा दे दिया गया था। हालांकि, परिवार में उस समय कोई जिम्मेदार व्यक्ति न होने के कारण यह पूरी जानकारी और दस्तावेज समय के साथ छिप गए और परिवार को इसकी गहराई से जानकारी नहीं मिल पाई थी।

कुछ समय पूर्व घर की सफाई के दौरान परिजनों को इन पुराने दस्तावेजों की जानकारी मिली, जिसके बाद कुमाऊं रेजिमेंट से संपर्क साधा गया। रेजिमेंट ने अब आधिकारिक रूप से शहादत से जुड़े सभी दस्तावेज परिजनों को सौंप दिए हैं, जिससे इस बात की पुष्टि हुई कि उन्होंने देश के लिए कितनी बड़ी कुर्बानी दी थी।
रंगून मेमोरियल में दर्ज है नाम
म्यांमार में बने ऐतिहासिक रंगून मेमोरियल की दीवार पर शहीद रामदत्त चौबे का नाम खुदा हुआ है। उनका नाम इस स्मारक के फेस 43 पर अंकित है, जो उनके विदेशी भूमि पर दिए गए बलिदान की गवाही देता है। दूसरी ओर, परिजनों ने प्रशासन और शासन से मांग की है कि छमनिया में निर्माणाधीन बालिका स्पोर्ट्स कॉलेज का नाम इस वीर शहीद के नाम पर रखा जाए ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके इस बलिदान को याद रख सकें। इस संबंध में जिला अधिकारी मनीष कुमार के अलावा शासन को ज्ञापन भी सौंपा गया है, और परिजनों को इस मामले में उचित कार्यवाही करने का आश्वासन भी मिला है।
















