सुप्रीम कोर्ट ने जहरीली शराब की घटनाओं पर अंकुश लगाने के महाराष्ट्र सरकार के प्रयासों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि जबरन संयम या पाबंदी शराब की लत का समाधान नहीं है। शीर्ष अदालत ने ‘महाराष्ट्र पॉइजन्स रूल्स’ के उन प्रावधानों को रद्द कर दिया है, जिनके तहत गैर-दवा निर्माताओं को बेचने से पहले मेथनॉल में विशेष रंग और कड़वा पदार्थ मिलाना अनिवार्य किया गया था।


जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने स्पष्ट किया कि 2011 की अधिसूचना के माध्यम से शामिल किए गए नियम संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 19(1)(g) का उल्लंघन करते हैं। अदालत ने माना कि मेथनॉल में कड़वे और रंगीन पदार्थों का इस्तेमाल करने से शराब की लत को रोका नहीं जा सकता है, बल्कि इससे वैध केमिकल उद्योगों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ता है।

पीठ ने अपने फैसले में कहा कि इतिहास इस बात का गवाह है कि शराब पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने से यह कारोबार भूमिगत हो जाता है, जिससे अवैध और जानलेवा शराब का चलन और अधिक बढ़ जाता है। अदालत ने उदाहरण देते हुए कहा कि कड़े शराबबंदी वाले राज्यों में भी अवैध शराब की त्रासदियों के मामले सामने आते रहे हैं।

शीर्ष अदालत ने जहरीली शराब की इन दुर्घटनाओं को रोकने के लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को बहु-विभागीय और समन्वित दृष्टिकोण अपनाने का सुझाव दिया है। अदालत का मानना है कि अवैध विनिर्माण, परिवहन और बिक्री पर रोक लगाने के लिए उत्पाद शुल्क कानूनों के तहत अधिक कड़े नियामक उपायों की आवश्यकता है।


















