विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर (SIR) के तहत मतदाताओं को भारी संख्या में नोटिस मिलने के पीछे चुनाव आयोग द्वारा नियमों में किए गए अहम बदलाव मुख्य वजह हैं। यह प्रक्रिया बिहार में एसआईआर के पहले चरण के अनुभवों के आधार पर तैयार की गई थी, जिसके बाद कई राज्यों में नियमों में बदलाव किए गए।


नियमों में क्या बदलाव किए गए?
बिहार में एसआईआर के पहले चरण के दौरान एन्यूमरेशन यानी गिनती के चरण में ही वोटरों को अपनी योग्यता साबित करने के लिए दस्तावेज प्रस्तुत करने होते थे। जन्म, नागरिकता और निवास के प्रमाण के तौर पर कई दस्तावेजों को मंजूरी दी गई थी। हालांकि, जिनके पास ये दस्तावेज नहीं थे, उन्हें सूची से बाहर होने का खतरा महसूस हुआ और इस पर काफी हंगामा हुआ। इसके बाद, चुनाव आयोग ने अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में होने वाले दूसरे चरण के लिए नियमों में बदलाव कर दिया।

अब एन्यूमरेशन फॉर्म के साथ दस्तावेज जमा करने की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया गया है। इसके बजाय, पुरानी एसआईआर वोटर लिस्ट के साथ मतदाताओं की मैपिंग की प्रक्रिया शुरू की गई। इस प्रणाली में इनबिल्ट एल्गोरिदम का उपयोग किया जाता है, जो पुरानी सूची और नए फॉर्म के बीच तार्किक अंतर का पता लगाकर स्वतः नोटिस जारी करता है। अधिकारियों का कहना है कि यह सॉफ्टवेयर पूरी तरह निष्पक्ष है और आम आदमी तथा वीआईपी के बीच कोई भेद नहीं करता।

नोटिस मिलने के अन्य कारण और प्रक्रिया
इतनी बड़ी संख्या में नोटिस मिलने की घटना दिल्ली जैसे शहरी क्षेत्रों में अधिक देखी गई है, जहां मतदाताओं द्वारा फॉर्म भरते समय कुछ सावधानियां छूट गई होंगी। इसके अलावा, यदि बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) गिनती के चरण में फॉर्म की जांच अधिक सावधानी से करते, तो इन कमियों को काफी हद तक टाला जा सकता था। अधूरे या गलत जानकारी वाले फॉर्म मिलने पर भी नोटिस जारी किए जाते हैं।
अधिकारियों के अनुसार, केवल नोटिस मिलने मात्र से किसी भी मतदाता का नाम सूची से नहीं काटा जाता है। गड़बड़ी को सुधारने के लिए दस्तावेज पेश करते ही मामले का समाधान कर दिया जाता है। किसी भी मतदाता का नाम बिना सुनवाई के नहीं हटाया जाता और सुनवाई पूरी होने के बाद एक लिखित आदेश जारी किया जाता है, जिसे उचित मंचों पर चुनौती भी दी जा सकती है। इसके साथ ही, नाम छूट जाने पर फॉर्म 6 भरकर दोबारा नाम जुड़वाने का विकल्प हमेशा उपलब्ध रहता है।


















