अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट, 2026’ नामक विधेयक पर हस्ताक्षर कर दिए हैं, जिससे यह अब एक नया कानून बन गया है। इस कदम के बाद रूस और ईरान से तेल खरीदने वाले देशों जैसे भारत और चीन के लिए 100 प्रतिशत तक शुल्क का सामना करने की स्थिति पैदा हो गई है। ट्रंप प्रशासन के विवरण के अनुसार, राष्ट्रपति को अगले 30 दिनों के भीतर उन प्रमुख देशों पर शुल्क लगाना होगा जो रूस से तेल का आयात करते हैं।


भारत की ऊर्जा सुरक्षा और सरकार का रुख
भारत सरकार ने इस मामले पर अपनी स्थिति पहले ही स्पष्ट करते हुए कहा है कि देश के 140 करोड़ नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा। नई दिल्ली का स्पष्ट रुख रहा है कि तेल की खरीद लागत और उपलब्धता पर निर्भर करती है और आपूर्ति को कई अलग-अलग स्रोतों के जरिए विविध बनाया गया है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, इस विषय को अमेरिकी पक्ष के समक्ष उच्च स्तर पर उठाया जा चुका है और यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि ऐसे कदमों से द्विपक्षीय संबंधों पर असर पड़ सकता है। वर्तमान में जब वैश्विक स्तर पर तेल की आपूर्ति बाधित है और कीमतें अस्थिर हैं, तब रूस से आने वाला कच्चा तेल भारत की एक आवश्यक जरूरत बना हुआ है।

कूटनीतिक चर्चा और आगामी बैठकें
इस नए कानून के लागू होने के बाद भारतीय उत्पादों पर शुल्क लगाने का अंतिम निर्णय राष्ट्रपति ट्रंप के अधिकार क्षेत्र में आता है, जिनके पास छूट देने या समय सीमा में बदलाव करने का अधिकार भी है। आने वाले हफ्तों में इस गंभीर मुद्दे पर भारत और अमेरिका के बीच बातचीत होने की संभावना है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर के संयुक्त राष्ट्र के सम्मेलन में भाग लेने और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के जी-20 बैठक के सिलसिले में अमेरिका दौरे के दौरान अमेरिकी समकक्षों के साथ इस पर चर्चा हो सकती है, जिससे बीच का कोई रास्ता निकालने का प्रयास किया जा सके।

विशेषज्ञों की राय
दूसरी ओर, देश के प्रमुख थिंक टैंक ‘ग्ローバル ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव’ (GTRI) ने अपनी रिपोर्ट में सुझाव दिया है कि भारत को किसी भी अस्थायी राहत के एवज में लंबी ऊर्जा सुरक्षा या स्थायी व्यापार रियायतें नहीं देनी चाहिए। संस्था का मानना है कि रियायती रूसी कच्चे तेल से आयात का बिल कम होता है, ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती मिलती है और महंगाई को नियंत्रित रखने में मदद मिलती है। जब तक यह व्यावसायिक रूप से लाभदायक है, तब तक तेल की खरीद जारी रखनी चाहिए और एकतरफा रियायतों से बचना चाहिए।


















